तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या हमारे देश की एक महत्वपूर्ण समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या गरीबी, बेरोजगारी, अपराध, पारिवारिक विघटन आदि को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने के लिए उत्तरदायी है । बढ़ती हुई जनसंख्या ने देश के आर्थिक तथा सामाजिक विकास (Socio-economic development) को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित किया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय की गई समृद्ध भारत की कल्पनाएँ कहीं न कहीं तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या ने धूमिल कर दी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देशवासियों ने जो खुशहाल एवं विकसित राष्ट्र का सपना संजोया था वह तीव्र गति से बढ़ती जनसंख्या ने काफी हद तक चकनाचूर कर दिया है।2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या लगभग 121 करोड़ है। भारत का भौगोलिक क्षेत्रफल विश्व का लगभग 2.4 प्रतिशत है जबकि विश्व की लगभग 17.5 प्रतिशत जनसंख्या यहाँ निवास करती है। सामान्य तौर पर किसी देश की जनसंख्या में वार्षिक वृद्धि दर (0.2-0.5 प्रतिशत के मध्य होनी चाहिये जबकि भारत की जनसंख्या में वार्षिक वृद्धि दर लगभग 2 % है जो कि सामान्य से कहीं ज्यादा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश की जनसंख्या लगभग 35 करोड़ थी जो पिछले पैंसठ साल में लगभग साढे तीन गुना बढ़ गई है। भारत में प्रतिवर्ष जनसंख्या में लगभग 1.7 करोड़ की वृद्धि हो जाती है जो कि आष्टेलिया जितनी जनसंख्या के बराबर है।

जनसंख्या विस्फोट के प्रभाव (Effects of population explosion)

जनसंख्या में हो रही तीव्र वृद्धि के कारण विभिन्न सामाजिक एव आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न हो रही है, जिनमें से कुछ प्रमुख निम्न हैं

  • खाद्य समस्या – जनसंख्या में तीव्र गति से हो रही वृद्धि के कारण जनसंख्या की मांग के अनुरूप खाद्य पदार्थों की आपूर्ति नहीं हो पाती जिससे भुखमरी जैसी समस्या उत्पन्न हो जाती है |
  • मँहगाई
  • बेरोजगारी
  • गरीबी
  • निरक्षरता
  • जीवन स्तर में गिरावट
  • आवासीय समस्या
  • बढ़ता हुआ शहरीकरण
  • अपराधों में बढ़ोतरी
  • पारिवारिक विघटन आदि। ।